वर्तमान समय में जेन जेड और जेन अल्फ़ा जिस तरह भारत की संपूर्ण शिक्षा-व्यवस्था में झोल की पोल खोल रहे हैं उससे संघ-नीत मनुवादियों की शिक्षा व्यवस्था के खिलाफ जबरदस्त माहौल बना हुआ है। ऐसे महत्वपूर्ण दौर में कालजयी व्यंग्य लेखक हरिशंकर परसाई को याद करना बहुत ज़रूरी है जिन्होंने शिक्षा व्यवस्था की कमज़ोरियों पर कटाक्ष कर उस पर हावी सनातनियों की असलियत उजागर की थी। उन्होंने मिथकों के माध्यम से इस समस्या को गहराई से सामने रख कर अपने लेखकीय दायित्व का निर्वहन किया।
बहरहाल हम यहां उनके उन मिथकीय व्यंग्यों की चर्चा करेंगे जो काफी लोकप्रिय हुए और पोंगापंथियों के बीच ना केवल कसक छोड़ गये बल्कि समाज के शिक्षा संस्थानों की हालात का रहस्योद्घाटन भी कर दिया।परसाई के एक व्यंग्य लेख “लंका विजय के बाद” में देखें, वे लिखते हैं कि लंका विजय के बाद अयोध्या में आए वानरों ने बड़ा ही उत्पात मचाना प्रारंभ कर दिया। वे परिश्रम करना नहीं चाहते थे। क्योंकि उन्होंने रावण के साथ संग्राम में बड़ा ही परिश्रम किया था।
उनकी दिलचस्पी अब अयोध्या के विविध क्षेत्रों में उच्च पदों को पाने की थी ताकि वे अयोध्या पर शासन कर सकें। जब उन पदों पर योग्यता की बात आती है वे कहते हैं युद्ध के दौरान उनके शरीर पर लगे घाव ही उनकी योग्यता के प्रमाण हैं। वे राजा रामचंद्र से मांग करते हैं कि वे घावों की संख्या के आधार पर उनकी योग्यता निर्धारित करके शासन के पद दें।
अयोध्या में दफ्तर खुलता है और वहां के अधिकारी को अपने घाव दिखाकर प्रमाण पत्र मिलने लगते हैं। एक वानर अपने शरीर पर घाव ना देखकर परेशान है। राम रावण युद्ध के कारण चूंकि वह भाग गया था और रावण की मृत्यु के बाद अयोध्या लौटने वाली वानर सेना के साथ हो गया इसलिए उसके शरीर पर उस समय कोई घाव नहीं थे और अब क्योंकि घाव गिनकर पद मिल रहे हैं इसलिए वह शरीर पर घाव बनाता है।
उसकी पत्नी पूछती हैं – हे नाथ आप कौन सा पद लेंगे तो वह कहता है कि मैं कुलपति बनूंगा मुझे बचपन से विद्या से प्रेम है। मैं ऋषियों के आश्रम के आसपास मंडराता रहा हूं। मैं विद्यार्थियों की चोटी खींचकर भाग जाता था तथा हवन सामग्री तथा एक बार तो ऋषि का कमंडल ही ले भागा। इसी से तुम मेरे विद्या प्रेम का अनुमान लगा सकती हो। मैं कुलपति ही बनूंगा।”
इस व्यंग्य के जरिए उन्होंने शिक्षा संस्थानों में हो रही नियुक्तियों का पर्दाफाश किया है साथ ही यह भी कोशिश की गई है कि किस तरह अक्षम अध्यापक और अधिकारी पदों पर विराजमान हो रहे हैं। इसके लिए झूठे प्रमाणपत्र पेश किए जा रहे हैं साथ ही साथ चुनावी दौर में सहयोग करने वालों का यूं ही कर्ज का भुगतान भी हो रहा है। आज़ादी के चंद सालों बाद ही सरकार से परसाई का मोहभंग हो गया था। शिक्षा और शिक्षा संस्थानों की इस हालत में कैसे युवा तैयार हुए हम देख रहे हैं। छात्रों का बौद्धिक विकास कुंठित हो रहा है। अब तो बिना आईएएस और आईपीएस को नियुक्त किया जा रहा है।
इसी तरह जब एकलव्य से जब दाहिने हाथ का अंगूठा काटकर गुरु दक्षिणा के रूप में प्रस्तुत करने का आग्रह किया जाता है तो वह कहता है मैं बांए हाथ से भी कुशलता से परीक्षा दे सकता हूं तब आचार्य क्रोधित और दुखी हुए। उसी शाम उन्होंने अर्जुनदास से कहा एकलव्य का अंगूठा मैं नहीं ले सका। पर मेरे पास एक अकाट्य दांव है जिससे वह बच नहीं सकता तुम्हारा एक पेपर मुझे जांचने मिलने वाला है और दूसरा मित्र देवदत्त शर्मा को। इन दोनों में तुम्हें 100 में से 99 अंक मिल जायेंगे और तुम एकलव्य दास से आगे निकल जाओगे। समसामयिक हालातों पर मिथक के सहारे परसाई जी छात्रों के साथ हो रहे व्यवहार को सामने रखते हैं।
अब छात्रों का क्या दोष? वे गुरूजनो की मन:स्थितियों का फायदा उठाकर गुरु सेवा में तत्पर रहते हैं और पढ़ने से दूरी बना लेते हैं। वह गुरु पत्नियों की कलंक कथाएं सुनासुना कर खुश रखता है। सिनेमा, नाटक दिखाता है अपने गुरु का पूरा ध्यान रखता है। छात्रों की इस मानसिकता के निरंतर विस्तार पर परसाई की चिंता समाज को नहीं झकझोरती। छात्रों का हुजूम भी इस व्यवस्था के प्रति नतमस्तक हो जाता है, चंद लोग जो प्रतिरोध करते हैं उन्हें रेस्टीकेट कर अपराध की ओर धकेल दिया जाता है।
वर्तमान दौर में धनसम्पदा को महत्त्व देकर ज्ञान को किस तरह से निम्न दिखाने की निरंतर कोशिशें हो रही हैं “लक्ष्मी की विजय” व्यंग्य में परसाई उस घटनाक्रम का वर्णन करते हैं जिसके प्रारंभ में देवी लक्ष्मी भगवान विष्णु से संसार में धन वितरण करने का दायित्व अपने कंधे पर ले लेती हैं जिसे आगे चलकर अपना अधिकार मानकर धन का दुरुपयोग करती हैं। मूढ़मतियों को धन देकर उनसे सम्मान और पूजा प्राप्त कर लेती हैं।
बुद्धिमान और सदाचारी को कुछ नहीं देती और जिससे वह अत्यंत दुखी रहते हैं। इस संदर्भ में वह भगवान विष्णु से कहतीं हैं महराज ये दुष्ट है यह वीणा लिए हुए सरस्वती की पूजा करते हैं। बस इसीलिए इनका यह हाल है। देखती हूं, सरस्वती कैसे इनका पेट भरती है? अभिप्राय यह कि समाज में आज ज्ञान सम्मानहीन, धनहीन है और मूढ़मति लक्ष्मी की कृपा से धन और ऐश्वर्य के साथ सम्मान पा रहे हैं।
वस्तुत: आज की शिक्षा और परीक्षा की तमाम व्यवस्थाएं तथा कुल गुरु और परीक्षा नियंत्रकों पर सारा नियंत्रण उन्हीं लोगों के हाथों में जिनका ज़िक्र परसाई अपने व्यंग्य लेखन में साफ़ कह रहे हैं। आज शिक्षा में आमूलचूल परिवर्तन हेतु एक मंत्री के त्यागपत्र से संभव नहीं है। उस पद्धति को ही समाप्त करना होगा जो समाज का वर्ग विभाजन कर अपने तरीके से अच्छे अंक और पद हथिया रहा है।आज परसाई की याद पर समूची शिक्षा के सुदृढ़ीकरण के लिए युवाओं के साथ दिमागी नक्सल को भी जुटना होगा।
(सुसंस्कृति परिहार एक्टिविस्ट, टिप्पणीकार हैं।)